एनडीटीवी के एडिटर रवीश कुमार ने शनिवार को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में शिरकत की वहां उन्‍होंने हिंदी में अपनी बात रखी वहां उन्‍हें इंडिया कॉन्‍फ्रेंस 2018 में हिस्‍सा लेने के लिए आमंत्रित किया गया था उन्‍होंने वहां अपनी स्‍पीच में देश के वर्तमान हालात से लेकर छात्रों से जुड़े विषयों पर भी अपनी बात रखी.आप सभी का शुक्रिया इतनी दूर से बुलाया वो भी सुनने के लिए जब कोई किसी की नहीं सुन रहा है,इंटरव्यू की विश्वसनीयता इतनी गिर चुकी है कि अब सिर्फ स्पीच और स्टैंडअप कॉमेडी का ही सहारा रह गया है,सवालों के जवाब नहीं हैं बल्कि नेता जी के आशीर्वचन रह गए हैं,भारत में दो तरह की सरकारें हैं एक गवर्नमेंट ऑफ इंडिया दूसरी गर्वनमेंट ऑफ मीडिया मैं यहां गवर्नमेंट ऑफ मीडिया तक ही सीमित रहूंगा ताकि किसी को बुरा न लगे कि मैंने विदेश में गर्वनमेंट ऑफ इंडिया के बारे में कुछ कह दिया यह आप पर निर्भर करता है कि मुझे सुनते हुए आप मीडिया और इंडिया में कितना फ़र्क कर पाते हैं.

एक को जनता ने चुना है और दूसरे ने ख़ुद को सरकार के लिए चुन लिया है एक का चुनाव वोट से हुआ है और एक का रेटिंग से होता रहता है यहां अमरीका में मीडिया है,भारत में गोदी मीडिया है,मैं एक-एक उदाहरण देकर अपना भाषण लंबा नहीं करना चाहता और न ही आपको शर्मिंदा करने का मेरा कोई इरादा है,गर्वनमेंट ऑफ मीडिया में बहुत कुछ अच्छा है,जैसे मौसम का समाचार एक्सिडेंट की ख़बरें सायना और सिंधु का जीतना, दंगल का सुपरहिट होना ऐसा नहीं है कि कुछ भी अच्छा नहीं है, चपरासी के 14 पदों के लिए लाखों नौजवान लाइन में खड़े हैं, कौन कहता है उम्मीद नहीं है, कॉलेजों में छह छह साल में बीए करने वाले लाखों नौजवान इंतज़ार कर रहे हैं, कौन कहता है कि उम्मीद नहीं बची है, उम्मीद ही तो बची हुई है कि उसके पीछे ये नौजवान बचे हुए हैं.

एक डरा हुआ पत्रकार लोकतंत्र में मरा हुआ नागरिक पैदा करता है, एक डरा हुआ पत्रकार आपका हीरो बन जाए, इसका मतलब आपने डर को अपना घर दे दिया है, इस वक्त भारत के लोकतंत्र को भारत के मीडिया से ख़तरा है, भारत का टीवी मीडिया लोकतंत्र के ख़िलाफ़ हो गया है, भारत का प्रिंट मीडिया चुपचाप उस क़त्ल में शामिल है जिसमें बहता हुआ ख़ून तो नहीं दिखता है, मगर इधर-उधर कोने में छापी जा रही कुछ काम की ख़बरों में क़त्ल की आह सुनाई दे जाती है.सीबीआई कोर्ट के जज बी एच लोया की मौत इस बात का प्रमाण है कि भारत का मीडिया किसके साथ है. कैरवान पत्रिका की रिपोर्ट आने के बाद दिल्ली के एंकर आसमान की तरफ देखने लगे और हवाओं में नमी की मात्रा वाली ख़बरें पढ़ने लगे थे. यहां तक कि इस डर का शिकार विपक्षी पार्टियां भी हो गईं हैं. उनके नेताओं को बड़ी देर बाद हिम्मत आई कि जज लोया की मौत के सवालों की जांच की मांग की जाए. जब हिम्मत आई तब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की बेंच जज लोया के मामले की सुनवाई कर रही थी. इसके बाद भी कांग्रेस पार्टी ने जब जज लोया से संबंधित पूर्व जजों की मौत पर सवाल उठाया तो उसे दिल्ली के अख़बारों ने नहीं छापा,चैनलों ने नहीं दिखाया.

ऐसा नहीं है कि गर्वनमेंट ऑफ मीडिया सवाल करना भूल गया उसने राहुल गांधी के स्टार वार्स देखने पर कितना बड़ा सवाल किया था आप कह सकते हैं कि गर्वनमेंट ऑफ इंडिया चाहती है कि विपक्ष का नेता सीरीयस रहे लेकिन जब वह नेता सीरीयस होकर जज लोया को लेकर प्रेस कांफ्रेंस कर देता है तो मीडिया अपना सीरीयसनेस भूल जाता है,दोस्तों याद रखना मैं गर्वनमेंट ऑफ मीडिया की बात कर रहा हूं,विदेश में गर्वनमेंट ऑफ इंडिया की बात नहीं कर रहा हूं.मीडिया में क्या कोई ख़ुद से डर गया है या किसी के डराने से डर गया है, यह एक खुला प्रश्न है,डर का डीएनए से कोई लेना देना नहीं है,कोई भी डर सकता है,ख़ासकर फर्ज़ी केस में फंसाना और कई साल तक मुकदमों को लटकाना जहां आसान हो, वहां डर सिस्टम का पार्ट है, डर नेचुरल है,गांधी ने जेल जाकर हमें जेल के डर से आज़ाद करा दिया ग़ुलाम भारत के ग़रीब से ग़रीब और अनपढ़ से अनपढ़ लोग जेल के डर से आज़ाद हो गए 2जी में दो लाख करोड़ का घोटाला हुआ था.

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