भारत में मुसलमानों की मौजूदा हालात को देखते हुए एक दूसरे नज़रिये से सोच रहा हूँ.कुछ चीज़ें हैं जो भारत के दूसरे समुदायों की अपेक्षा मुसलमानों के पास अधिक संख्या में हैं.उन पर गौर करने के बाद कुछ कहना चाहूंगा।पहले यह मूल्यांकन पढ़िए और फिर मेरे सवालों को ……
1.सबसे ज़्यादा वक्ता:मुसलमानों के पासजितने धार्मिक वक्ता मुसलमानों के पास हैं मुश्किल से ही इस देश में किसी दूसरे समुदाय के पास होंगे,धार्मिक वक्ताओं से अलग भी बहुत ही मुस्लिम बुद्धजीवी हैं जो घण्टों भाषण दे सकते हैं और तमाम मुद्दों पर अपनी राय रख सकते हैं.

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2.सबसे अधिक लाउडस्पीकर/माइक का प्रयोग:मुसलमान करते हैं-माइक,साउंड और लाऊड स्पीकर बनाने वाली किसी भी कंपनी में आप चले जाइए और वहां मालूम कर लीजिए तो आप को वहां पता चल जायेगा कि सबसे अधिक खरीददारी मुसलमान करते हैं.देश की लगभग सभी मस्जिदों में लाऊड स्पीकर लगे हैं,माइक है,जिनका प्रयोग समय समय पर होता है.इतना मुश्किल ही कोई दूसरे समुदाय के पास उपलब्ध हो.

3.सबसे अधिक शैक्षिक संसथान:मुसलमानों के पास-देश भर में मदरसों की गिनती आप नहीं कर सकते.करोड़ों की संख्या में हैं.एक छोटे से गांव के छप्पर में चलने वाले मदरसे से लेकर बड़े बड़े नाम वाले मदरसे.जहाँ दिन रात शिक्षा की अलख जगाई जा रही है.इन मदरसों के अलावा भी बहुत सी शैक्षिक संस्थाएं मुसलमान चला रहे हैं और देश में शिक्षा को बढ़ावा दे रहे हैं.
4.सबसे अधिक प्रकाशन:मुसलमान कराता है-देश भर में आप जब खोजिये तो आपको यह पता चलेगा कि पुस्तकों,हैंडबिलों और छोटी छोटी पुस्तिकाओं का प्रकाशन सबसे अधिक मुसलमान कराता है.देश के हर शहर में धार्मिक पुस्तकों के बुक स्टाल आपको मिल जायेंगे.बड़े से बड़े शहर में भी आपको इस्लामिक बुक्स के प्रकाशक मिलेंगे.इन सबके अलावा भी मुसलमान तमाम दूसरे विषयों पर अपनी पुस्तकें प्रकाशित कराते मिल जायेंगे.

…..तो बात यह कहनी चाह रहा था कि इतना सब कुछ होने के बाद भी मुसलमान इतना पिछड़ा क्यों है?मुसलमानों की आवाज़ दबी क्यों रहती है?
क्या मुसलमान इन संसाधनों का प्रयोग सिर्फ यूँही कर रहा है?क्या मुसलमान सही दिशा में नहीं सोचता?सवाल और भी हो सकते हैं,उन लोगों से भी जो मुसलमानों को देश में गैर की तरह समझते हैं और भारत को अपनी जागीर समझते हैं.मगर फ़िलहाल सवाल ख़ुद से ही हैं.
लेखक मोहम्मद नजमुज़्ज़मां AMU के छात्रनेता और रिसर्च स्कॉलर हैं

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