आप अक्सर बहुत से तथाकथित बुद्धजीवी और तथाकथित सेक्युलर या लिबरल लोगों के मुंह से एक बात जरूर सुनते पाए जायेंगे कि “ओवैसी/आज़म के बयान भी तो वैसे ही होते हैं जैसे आरएसएस चाहती है”।मगर मेरा उन बुद्धजीवियों और महानुभावों से सवाल यह है कि जब आरएसएस का जन्म हुआ था उस समय कोई ओवैसी या आज़म थे क्या ? जब काला पानी की सजा के लिए माफी मांगकर वापस आने वाला एक व्यक्ति एक विशेष नफ़रत वाली विचारधारा की नींव रख रहा तब तब क्या ओवैसी या आज़म के बयान आते थे ? नहीं न।

नफ़रत की बुनियाद पर पैदा हुई आरएसएस का मक़सद हमेशा से यही रहा है कि देश को बांटकर इस पर अपना क़ब्ज़ा जमाना।उसको किसी ओवैसी या आज़म के बयान से कोई फायदा नहीं होता।क्योंकि 1925 में आरएसएस की जब स्थाना हुई उसी दिन उन चंद लोगों ने जो शपथ ली थी आज तक उसी पर क़ायम हैं और उस मक़सद को पूरा करने के लिए दिन रात कार्यरत हैं।देश भर में फैली आरएसएस की शाखाएं और उसके प्रचारक चौबीस घण्टे इस के लिए काम करते हैं। कब कैसे और क्या करना है यह आरएसएस के हर हर कैडर को ख़ूब अच्छे से पता है ।शाखा में नया नया ज्वाइन हुआ कोई स्वंय सेवक हो या देश के किसी अहम पद पर बैठा स्वयं सेवक हो । उनको अपने काम की पूरी जानकारी है और वह उस दिशा में बराबर काम करते रहते हैं।

आखिर में बात उन चंद उर्दू नाम वालों की भी की जा सकती है जो इंद्रेश कुमार की देख रेख में चल रहे मुस्लिम मंच से जुड़कर काम कर रहे हैं। आखिर जिस विचारधारा का जन्म ही मुस्लिम मुक्त भारत करने के लिए हुआ हो।जिसका मक़सद ही हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हो।उस विचारधारा के साथ खड़ा उर्दू नाम वाला शख़्स शक़ के घेरे में आयेगा ही।अब कभी ओवैसी या आज़म के बयान को बहाना बनाकर आरएसएस का पक्ष ले, तो उससे ज़रूर सवाल करना कि जब देश आज़ाद ही नहीं हुआ था उस वक़्त आरएसएस के स्थापना की क्या ज़रूरत थी। और उस समय कौन सा ऐसा नेता था जो आरएसएस को अपने बयान से फायदा पहुंचा रहा था।
मो. नजमुज्जमा
(लेखक अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के रिसर्च स्कॉलर है)

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