कासगंज…मामला कासगंज का है. यहाँ संजय जाटव नामक एक युवक की शादी में जो हुआ वो एक तरह से मिसाल है. संजय जाटव हाथरस के हैं और उन्हें पास के कासगंज जिले की एक लड़की से प्यार हो गया. शीतल और संजय का प्यार धीरे धीरे परवान चढ़ा और बात शादी तक पहुंची. शादी तक बात जब पहुंची तो घरवालों के बीच बातचीत हुई और वो भी मान गए. कुल मिलाकर अभी सब कुछ ठीक ही चल रहा था. प्यार है तो कुछ तो मुश्किल आनी ही है सो आ गयी.


संजय जाटव की शादी के मौके पर जब बरात की बात आयी तो कासगंज के निज़ामपुर गाँव के ठाकुर इस बात पर अड़ गए कि बरात में संजय घोड़ी नहीं चढ़ेगा क्यूंकि संजय दलित है. दलितों की शादी इस गाँव में कभी भी ऐसी नहीं हुई थी कि दूल्हा घोड़ी चढ़े. संजय इस बात पर अड़ गए कि अगर शादी में घोड़ी चढ़ने का रिवाज है तो ये सिर्फ ठाकुरों के लिए क्यूँ. तमाम बहस और बातों के बीच संजय को काफी संघर्ष के बाद पुलिस सुरक्षा मिली.


अब ऐसे में जब बरात निकली तो बरात का स्वागत करने के लिए एक भी ठाकुर गांव में नहीं था. दलितों की शादी में गाँव के ठाकुर शामिल नहीं हुआ, ये तो कोई बात नहीं लेकिन शादी वाले दिन सभी ठाकुर मर्द गाँव से बाहर रहे और सभी ठाकुर औरतें घरों को बंद करके बैठी रहीं. इस तरह का छुआछूत आज भी हमारे समाज में बाकी है. दलितों को अपने बराबर आता देख किस तरह कुछ जातीय मानसिकता के लोगों को परेशानी होती है ये सामने नज़र आ रहा है.

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