“मौत लिखी हुई ना हो तो मौत ख़ुद ज़िन्दगी की हिफाज़त करती है और जब मौत मुक़द्दर में हो तो ज़िन्दगी दौड़ती हुई जाकर लिपट जाती है.ज़िन्दगी से ज़्यादा कोई जी नही सकता और मौत से पहले कोई मार नही सकता.दुनिया के बुज़दिलो को मेरा पैग़ाम सुना देना कि अगर मैदान-ए-जंग में मौत होती तो खालिद बिन वलीद कभी बिस्तर पे न मरता.”खालिद बिन वलीद जो रणनीति और कौशल के लिए विख्यात है का जन्म 592 ईस्वी में अरब के एक नामवर परिवार में हुआ था.खालिद बिन वलीद ने जब इस्लाम मज़हब स्वीकार नही किया था तब तक इस्लाम के कट्टर शत्रु थे लेकीन 628 ईस्वी में आपने इस्लाम स्वीकार किया.


इसके बाद हजरत मुहम्मद के एक मुख्य मित्र (सहाबी) के रुप में पहचान बनाई.पैगम्बर हजरत मुहम्मद के दुनिया से पर्दा कर लेने के बाद जब इस्लाम के उत्तराधिकारी जिन्हे रशीदुन खलीफा के रुप मेँ जाना जाता हजरत अबू बकर (र.अ.) और खलीफा उमर (र.अ.) की ख़िलाफ़त में इस्लामी सेना के कमांडर नियुक्त किए गये.7 वी शताब्दी में जो इस्लामी सेना को सफलता प्राप्त हुई उसका श्रेय खालिद बिन वलीद को दिया जाता है इन्होने अलग अलग सौ से ज्यादा जंगो एवम् लड़ाईयो का नेतृत्व किया.रशीदुन सेना का नेतृत्व करते हुए रोमन, सीरिया, मिस्त्र, फारस, मेसोपोटामिया पर इस्लामी सेना ने सफलतापुर्वक विजय प्राप्त की जिसके लिए खालिद बिन वालिद को सैफ अल्लाह या “अल्लाह की तलवार” के नाम से जाता है.


आपकी वफ़ात सेना सेवा समाप्ति के चार वर्ष वाद 642 ईस्वी मे होम्स सीरिया में हुई थी.आपको होम्स में ही दफनाया गया था, उस स्थान पर आपके नाम से मस्जिद भी मौजूद है और जहाँ तक इस्लामी जंग एवम् लड़ाईयो पर चर्चा की जाये तो खालिद बिन वलीद का नाम प्रमुखता से लिया जाता क्यों कि हर जंग में जांबाज़ी तथा पैंतरेबाज़ी एवम् होशियारी थी जिससे दुश्मन सेना के छक्के छुट जाते थे तथा दुनिया के एकमात्र ऐसे कमांडर है जिन्होने अपने जीवन में एक भी जंग या लड़ाई नही हारी.


बैजनटाइन और सस्सविद साम्राज्यों को कई जंगो में रौंदा…
खालिद बिन वलीद हर जंग में कामयाब हुए.उन्होंने एक तरफ शक्तिशाली बैजनटाइन साम्राज्य को यूरोप तक सीमित कर दिया वही इरान में मौजूद शक्ति शाली सस्सविद हुकुमत का तो अस्तित्व ही मिट गया.एक बात गौर करने वाली है अरबो के सैनिको की संख्या दोनों साम्राज्य के सैनिको से जंग में कम होती थी लेकिन खालिद बिन वलीद ने अपने रणनीति के बल पर हर जंग में दुश्मन को शिकस्त दी.


खालिद बिन वलीद पहले रक्षात्मक फिर उसके बाद छापामार रणनीति के साथ ऐसी घेरेबंदी करते थे कि सेना ज्यादा होने के बाद भी बैजनटाइन और सस्सविद हर युद्द में हारते चले गये.

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