पिछले कुछ दशकों में एक नाम भी कोई नही गिना सकता जिस मुख्यमंत्री ने अखिलेश यादव की तरह अपने प्रदेश में काम किया हो। यूपी चुनाव के ठीक पहले कई बार सार्वजनिक जगहों पर हमने बीजेपी के कोर वोटर तक में अखिलेश जी की तारीफ सुनी। एक खास आरक्षण विरोधी वर्ग जो घृणा की हद तक इस पार्टी से नफरत करता है वो वर्ग भी तारीफ कर रहा था।

मैं उसी वक्त एक लेख लिखा था कि यूपी का चुनाव आप सिर्फ विकास के एजेंडे पर नही लड़ सकते, जाति इस देश का सबसे बड़ा सच है, इस चुनाव में अपने तमाम कामो के बावजूद सपा नही जीत पाएगी। क्योंकि अखिलेश यादव उस वक्त सिर्फ विकास को एजेंडा बना चुके थे। पूर्वांचल के कई नेता पार्टी सफाई के नाम पर बाहर किए जा चुके थे, आरक्षण, प्रतिनिधित्व, सोशल जस्टिस, अल्पसंख्यक जैसे मुद्दे छूट गए थे।

यही कारण है कि आरक्षण विरोधी वर्चस्ववादी शक्तियां भी अखिलेश यादव की तारीफ कर रहीं थीं। भारतीय राजनीति में जब आपका बेस वोट बैंक ओबीसी, दलित और अल्पसंख्यक हो और आपकी तारीफ इनके हक को मारने वाला करने लगे तो एक बार पीछे मुड़ कर अपने एजेंडा सेटिंग पर विचार करना चाहिए होता है।

अखिलेश यादव सरकार के दौरान फर्जी रिजेल्ट के आंकड़ों के आधार पर इन्ही आरक्षण विरोधियों ने एक जाति को चोर दलाल,विलेन साबित कर दिया। आधिकारिक तौर पर उस दौर में पार्टी ने इन अफवाहों का खंडन नही किया परिणाम स्वरूप देश के पीएम तक ने अपनी चुनावी रैलियों में उन्ही फर्जी आकड़ो के आधार पर यादव वर्सेज अदर ओबीसी का खेल खेल गए।

रायबरेली कांड में जहां दो जातियों के बीच संघर्ष काफी लंबा चला उसमें सपा के बेस वोटर जो एक तरह निर्दोष थे के पक्ष में स्वामी प्रसाद मौर्य तक गए उन्होंने उनके पक्ष में बयान तक दिया जबकि उनके विरोधी पक्ष की तरफ से सपा के स्वजातीय नेता न सिर्फ पहुंचते रहे बल्कि मामले को प्रभावित करते रहे।

अभी बौद्धिक महासभा में जब आप उन्हीके साथ गलबहियां करते हैं तो आपके उस बेस वोट बैंक को जो पार्टी स्थापना से लेकर आज तक आपके लिए खून पसीना बहाया है उसे कैसा लगा होगा, कभी सोचिएगा फुर्सत से। #इस वक्त के सपा के विचारक हम जैसों को हरामखोर, जातिवादी और न जाने क्या क्या बोल सकते हैं। लेकिन हमलोग इसी तरह लिखते रहेंगे।
सामाजिक चिन्तक एवं लेखक सुनील यादव की फेसबुक वाल से

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here